फोटो ग्राफर बना किसान कम जमीन में शुरू की करेले की खेतीऔर बन गया कामयाब किसान


 


सतीश शाक्य की यह कहानी क्षेत्र के उन हजारो किसानों के लिए बड़ी प्रेरणा है, जो कम भूमि और नाकाफी संसाधन के नाकामी में पूरी जिंदगी बदहाली में बिता देते हैं। फोटोग्राफर से बना किसान सतीश शाक्य ने नवीन तकनीकों के साथ अपनी मेहनत व लगन से क्षेत्र में एक नजीर पेश की है। ग्रामीण स्‍तर पर खेती से जुड़ा यह ऐसी तकनीक है। जिसे हर किसान कर सकता है, लेकिन करता नहीं है.


नकदी फसल का चयन
इटावा जनपद के जसवंतनगर लुधपुरा निवासी किसान सतीश शाक्य पहले अपनी एकड़ जमीन पर पिता भाइयों द्वारा परंपरागत तरीके से खेती कराया करते थे। पैदावार कम होने पर भी उनका मुख्‍य रूप से सब्जी उगाने और उसे बाजार में बेचने का काम था। लेकिन आज फोटोशूट सतीश ने किसानी करके दिखाने की कुछ ठानी उन्होंने लखनऊ में जाकर तीन दिवसीय किसान प्रशिक्षण प्राप्त कर वक्‍त के साथ उन्‍होंने खेती के तौर-तरीके बदले और मंडप तकनीकी अपनाकर करेले की फसल को उगाकर 1 बीघा जमीन पर तीन बीघा जमीन के बराबर पैदावारी की। इससे आने वाले अच्‍छे परिणाम से उत्‍साहित फोटोशूट सतीश शाक्य की आंखों में आज बेहतर भविष्‍य की चमक साफ देखी जा सकती है.


करेले की खेती
सतीश ने अपनी जमीन पर करेले की खेती शुरू की करेला की फसल से अच्छी पैदावार लेने के लिए उन्होंने गोबर की अच्छे तरीके से सड़ी-गली खाद को खेत में समान मात्रा में बिखेरा. फिर खेत की जुताई कर बुआई की। बुआई के समय जरूरत के मुताबिक डी.ए.पी. और कुछ म्यूरेट ऑफ पोटाश को अच्छी तरह से जमीन में मिलाया, बाकी कुछ यूरिया बुवाई के 20-25 दिन बाद व 50-55 दिन बाद पुष्पन व फलन की अवस्था में डाली।


पौधों को मजबूत सहारा मंडप तकनीक अपनाने से मिली मजबूती।


करेला के पौधों में मिट्‌टी चढ़ाना एवं सहारा देना आवश्यक होता है. पौधों को सहारा देने से फल मिट्‌टी एवं पानी के सम्पर्क मे नहीं आ पाते, जिससे फलों को सड़ने से बचाया जाता है। बेल भी नष्ट होने बचती है। बेल पौधों को सहारा देने के लिए रोपाई के 30 से 45 दिन के बाद मंडप तकनीक के तहत बांस और लकड़ी के डंडों में विभिन्न ऊंचाइयों पर छेद करके पौधों को तारों से सुतली बांधी जाती है। करेले की सिंचाई वातावरण, भूमि की किस्म, आदि पर निर्भर करती है। इसके साथ ही 5 से 7 दिन के अंतर पर इन पौधों की सिंचाई भी की जाती है। सतीश ने इस प्रक्रिया में कही कोताही नहीं बरती।


लागत से कई गुना हुई कमाई।


सतीश ने गत वर्ष 26 जनवरी को शुरू की चार माह के अंतराल में इस फसल से अभी तक लगभग 55 हजार रुपये के करेले बाजार में बेचे जा चुके है पर उन्‍हें महज 8000 रुपये खर्च आया। कुल आय से खर्च निकलने के बाद उन्हें 47,000 रुपये की शुद्ध आय प्राप्त हुई है। जबकि अभी भी वे करेले की खड़ी फसल से 3-4 बार और करेले तोड़े जाएंगे, जिससे उन्‍हें और भी कमाई होगी।


नमी खेत मे होती है अधिक उपज।


सतीश का मानना है कि करेले को विभिन्न प्रकार की जमीन पर उगाया जा सकता है, किन्तु उचित जल धारण क्षमता वाली जीवांश युक्त हल्‍की दोमट मिट्टी इसके लिए सर्वोत्तम मानी गई है और इसकी खेती के लिए अच्छी रहती है. हालांकि नदियों व पोखरों के किनारे वाली भूमि इसकी खेती के लिए सबसे उपयुक्त रहती है।